आज सिर्फ सुनहरी यादें
आज गुलजारजी का एक शेर याद आ रहा हैं। गुलजारजी कहतें हैं,
मिलता तो बहुत कुछ हैं इस जिंदगी में.......
बस हम गिनती उसी की करते हैं, जो हासिल ना हो सका।
गुलजारजी की बातों पर गौर करते हुए आज हम सिर्फ अच्छी बातों को याद करेंगे और आज का दिन बेहतर बनाएँगें।
अच्छी बातें बहुत सी हैं लेकिन हम खानपान से जुड़ी यादों का ही ज़िक्र करेंगे।
आज मैं आप से 'पालक चीला' से जुड़ी हुई यादें शेअर करूँगी।
बीस साल पहले की बात हैं। मेरे पती दिलिपजी गोवा में रहते थे और मैं बच्चों के साथ नासिक में रहती थी। एक दिन अखबार पढ़ रही थी तब कॉर्नर में छपें हुए विज्ञापन पर मेरी नज़र गयी। मैंने वह विज्ञापन ध्यान से पढ़ा। उसमें लिखा था,' नासिक का पहला फूड फेस्टिव्हल' फूड फेस्टिव्हल पढ़कर मेरी आँखे चौंक गयी। अरे यार, पहला 'फूड फेस्टिव्हल' और हम औरतें क्यों न शामील हो! दिमाग में घंटी बजी और तुरंत विज्ञापन में दिए हुए फोन नंबर को घुमा दिया। फोन पर बहुत सारी जानकारी हासिल करनें के बाद मैंने सोचा, 'चलो, स्टॉल बुक कर ही लेतें हैं।' स्टॉल बुक करनें के बारे में किसी को पुछूँगी तो सब कहेंगे, "क्या जरूरत पड़ी हैं तुझे? घर में खाना बनाती हैं, इतना काफ़ी नहीं हैं।" औरतों को हमेशा सुननें में मिलनेवाली इन्हीं शब्दों से मेरी कभी नहीं पटती। इसलिए न आगा देखा न पिछा तुरंत स्टॉल बुक किया और स्टॉल पर कौनसे व्यंजन रखनें चाहिये इस काम में लग गयी।
पहले दिन पँकींग की हुयी चीजें रखनी थी तो मैंने अलग अलग तरह की चटणीयाँ और नमकीन बनाकर सौ सौ ग्राम के पँकेट बनवाकर स्टॉल पर रख दिये।
दुसरे दिन प्याज के पकौड़े, सँडविच, आप्पे, बटाटेवडा और पालक चीला बनवायें।
स्टॉल पर आनेवाले सभी खवय्ये लोग आप्पे और पालक चीला नाम सुनकर सोच में पड़ जाते थ वो पहले दोनों व्यंजनों के बारे में पुछतें और फिर ऑर्डर देते थे।
एक पालक चीला लेनेवाले ग्राहक दो या तीन पालक चीला खा के ही जाते थे। पालक चीला खानेवालें औरत हो या आदमी सभी ने मुझसे पालक चीला कैसे बनातें हैं इस बारे में पूछकर जानकारी लेते थे।
दो बुढ़े दोस्त शाम सात बजें स्टॉल पर आते थे और पेटभर के पालक चीला, आप्पे खाते थे। वे दोनों साथ में खाली डिब्बा लाते थे और जाते समय डिब्बे में दो प्लेट पालक चीला, आप्पे भर के ले जाते थे। एक दिन मुझसे रहा नहीं गया। मैने उन दोनों को पूंंछ लिया,"अंकल, आप यहाँ खानें के बाद भी डिब्बे मे पँक कर के पालक चीला, आप्पे क्यूँ ले के जाते हैं? पालक चीला, आप्पे ठंडा खानें में मज़ा नहीं आता।" मेरी बात सुनकर दोनों अंकल ने जवाब दिया,"बेटी, तेरे हाथ से बनाए हुए पालक चिला और आप्पे ठंडा खानें का भी एक अलग मज़ा हैं। हम दोनों दोस्त हैं, हमारे बेटे अमेरिका में रहते हैं, हम दोस्त यहाँ आकर खा सकतें हैं लेकिन हम दोनों की पत्नीयाँ घुटनें के दर्द से परेशान हैं। अपनी अपनी स्वीट हार्ट के लिए पालक चीला, आप्पे डिब्बे में भरकर ले जाते हैं। रोज़ रोज़ मेस का खाना खा कर बोअर हो गए थे। तेरे हाथ से बनाया हुआ सँडविच, पकौड़े, बटाटेवडा, पालक चीला, आप्पे खा के हम खूश हो गए।"
उन दोनों अंकल की बात सुनकर जितना अच्छा लगा उतना बुरा ही लगा। बुरा इसलिए लगा की, बुढ़ापे मे बच्चों के बिना अकेले रहना कितना मुश्कील होता हैं फिर भी अपनी अपनी ज़िदगी जीना ही हैं क्या करे। दोनों अंकल के लिए स्वास्थ्य भरी ज़िदगी की शुभकामनाएँ दी और मैं किसी अनज़ान लोगों को खानें के जरीए कुछ पल के लिए खुशियाँ दे सकी इसलिए अपनें आप को शाबाशी दे दी।
आप भी खाना बनातें समय जिन लोगों ने आप के खानें की तारीफ़ की हैं, उन्हीं यादों को याद कर के खाना बनाईये। आप को खाना बनाना बोअरींग नहीं लगेगा। कर के तो देखिए और अपना अनुभव बताईये।
©ज्योत्स्ना पाटील
©ज्योत्स्ना पाटील
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