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Friday, 3 May 2019

सब्जीवाली खिचडी की सज़ा

         सब्जीवाली खिचडी की सज़ा
           पूरे भारत में खिचडी खानेवालों की कमी नहीं हैं। खिचडी का नाम लेते ही दाल चावल आँखो के सामने आ जाते हैं लेकीन बचपन में माँ के घर जो खिचडी बनती थी वो खिचडी मुझे पूरी सब्जी मंडी की याद दिला देती हैं। माँ के घर की खिचडी का सब्जी मंडी से नाता जुड़ने की वजह कुछ अलग ही हैं।
         मेरे पिताजी ब्राम्हणगांव (जि. नासिक,महाराष्ट्र) में रहते थे। वहाँ वे शिक्षक की नौकरी करते थे। मेरे पिताजी को गाँव के लोग कहते थे,"सरजी,हमारे बच्चों की ट्यूशन लिजिये।" मेरे पिताजी को 'ट्यूशन' के नाम से ही नफ़रत थी।
मेरे पिताजी गाँव के लोगों को कहतें थे, "मैं जो विषय बच्चों को पढ़ाता हुँ, उस विषय की ट्यूशन लगाने की कोई जरूरत नहीं।" पिताजी की बात सुनकर गाँव के लोग कहतें थे, "आप के विषय बच्चों को पढ़ानें की जरूरत नहीं हैं, यह हम जानते हैं। बच्चों को दुसरें विषय तो आप पढ़ा सकते हैं।" गाँववाले जिद पर उतर गये तब पिताजी ने कहा, "मैं ट्यूशन लेने के लिए तैय्यार हुँ लेकीन मेरी ट्यूशन का फिक्स समय नहीं रहेगा और मैं ट्यूशन के पैसे नहीं लुँगा।
         पिताजी की शर्ते मानकर गाँववाले बच्चों को हमारे यहाँ ट्यूशन के लिए भेजने लगे और सारी सब्जी मंडी हमारे घर आ के बैठ गयी। गाँववाले भी बहुत होशियार थे। सर, ट्यूशन की फीस नहीं लेते हैं तो वे अपने खेती में जो अनाज़ उपजता था, वो अनाज, सब्जीयाँ ,फल, दूध घर भेज देते थे।
         कभी कभी एक ही सब्जी चार पाँच बच्चे ले आते तब वो सब्जी गली में दुसरे घरों में बाँटकर ही बहुत सारी बचती थी तब मेरी माँ एक बार सब्जी बनाती और बची हुयी सब्जी सिधे खिचडी मे डाल देती थी। इसलिए हमारे यहाँ गोबी खिचडी, पालक खिचडी, मटार खिचडी, बीन्स की खिचडी, दुधी की खिचडी, सिमला मिरची की खिचडी, टमाटर खिचडी, फुलवर की खिचडी ऐसी बहुत सारी सब्जीयाँ खिचडी में दाल चावल के साथ झिम्मा खेलती थी। हम माँ को कहतें थे, "अच्छा हैं, सब्जी के कारण अपने दाल चावल तो बच जाते हैं।" सभी हँसनें लगते। 'ज्ञान बाँटनें के लिए होता हैं, पैसा कमानें के लिए नहीं'  पिताजी की यही सोच की शिक्षा हम सब को सब्जीवाली खिचडी खाकर मिलती थी पर हमें पिताजी की सोच पर गर्व था , हैं और रहेगा। आज की बाजारू शिक्षा प्रणाली को देखकर हम मेरे पिताजी को शत शत प्रणाम करते हैं।
     खिचडी से जुड़ी बहुत सारी बातें है। आज के लिए इतना ही।

©ज्योत्स्ना पाटील 

Wednesday, 1 May 2019

पोहा और बच्चों की संवेदना

सभी पाठ़कोंं को मेरा प्रणाम।
          पोहा और बच्चों की संवेदना
महाराष्ट्रा में सभी जगह पर सुबह के नाश्ते में उपमा, मिसल और पोहा खाया जाता हैं वैसे तो इडली, डोसा, वडा सांभार, सँडविच, छोले भटुरे भी खाते हैं लेकीन ज्यादा तर पोहा, उपमा खाते हैं।
मेरे पती और बच्चे जिस दिन आराम से नाश्ता करते हैं उस दिन मैं नाश्ते की प्लेट सजाकर देती हूँ। दो दिन की छुट्टी थी तो बच्चे घर आए थे सुबह आराम से उठे ब्रश करके सीधे चाय पिने बैठे और बातें करने बैठ गयें। मैने देखा तो अब ये तीनो दो घंटे तक उठनें का नाम नहीं लेंगे मेरे मन ने कहाँ 'चल ज्योत्स्ना, तू चल तेरे  काम पर इनके साथ बैठकर कुछ नहीं होगा क्योंकी ए चिल्लाचिल्लाकर बातें करके थक जायेंगे और बाद में तुझंपर ही चिल्लायेंगे,' "मम्मी भूक लगी, जल्दी नाश्ता दो।" तीनो का बातें करने का मूड देखकर मैं सीधे नाश्ता बनाने के लिए रसोई में गयी। आज नाश्ता आराम से देना था इसलिए मैने पोहा बनाकर प्लेट सजायी।
दिलिप को और बेटा, बेटी तीनो के हाथ में नाश्ते की प्लेट थमा दी। प्लेट की तरफ देखकर मेरा बेटा स्वप्नील बोला, "मम्मी, प्लेट को देखकर खाने का दिल कर रहा हैं लेकीन सजाये हुए पोहा को तोडने का दिल नहीं करता। बेटे की बात सुनकर बहुत अच्छा लगा क्योंकी बेजान चिजों को तोडने का दिल नहीं होता तब मेरा बेटा दुसरे के दिल को तोडने के बारे में सौ बार सोचेगा। किसी के आँगन में रंगोली हो और उस रंगोली पर किसी ने पैर रखकर रंगोली बिघाड दी तो मेरे बेटे और बेटी को बहुत ही बुरा लागता हैं, तब दोनों के मुँह से एक ही बात निकलती हैं, "कौन बेवकूफ था। उसे रंगोली दिखायी नहीं दी क्या!" बच्चे संवेदनशील होना यहीं धनदौलत हैं। 

©ज्योत्स्ना पाटील                

गाजर टमाटर उत्तप्पा

 आज की रेसिपी - गाजर टमाटर उत्तप्पा सभी फूड़ी दोस्तों को नमस्ते। आज की रेसिपी सभी को जरूर पसंद आएगी क्योंकी हम दोसा, उत्तप्पा तो हमेशा खाते ह...