सब्जीवाली खिचडी की सज़ा
पूरे भारत में खिचडी खानेवालों की कमी नहीं हैं। खिचडी का नाम लेते ही दाल चावल आँखो के सामने आ जाते हैं लेकीन बचपन में माँ के घर जो खिचडी बनती थी वो खिचडी मुझे पूरी सब्जी मंडी की याद दिला देती हैं। माँ के घर की खिचडी का सब्जी मंडी से नाता जुड़ने की वजह कुछ अलग ही हैं।
मेरे पिताजी ब्राम्हणगांव (जि. नासिक,महाराष्ट्र) में रहते थे। वहाँ वे शिक्षक की नौकरी करते थे। मेरे पिताजी को गाँव के लोग कहते थे,"सरजी,हमारे बच्चों की ट्यूशन लिजिये।" मेरे पिताजी को 'ट्यूशन' के नाम से ही नफ़रत थी।
मेरे पिताजी गाँव के लोगों को कहतें थे, "मैं जो विषय बच्चों को पढ़ाता हुँ, उस विषय की ट्यूशन लगाने की कोई जरूरत नहीं।" पिताजी की बात सुनकर गाँव के लोग कहतें थे, "आप के विषय बच्चों को पढ़ानें की जरूरत नहीं हैं, यह हम जानते हैं। बच्चों को दुसरें विषय तो आप पढ़ा सकते हैं।" गाँववाले जिद पर उतर गये तब पिताजी ने कहा, "मैं ट्यूशन लेने के लिए तैय्यार हुँ लेकीन मेरी ट्यूशन का फिक्स समय नहीं रहेगा और मैं ट्यूशन के पैसे नहीं लुँगा।
पिताजी की शर्ते मानकर गाँववाले बच्चों को हमारे यहाँ ट्यूशन के लिए भेजने लगे और सारी सब्जी मंडी हमारे घर आ के बैठ गयी। गाँववाले भी बहुत होशियार थे। सर, ट्यूशन की फीस नहीं लेते हैं तो वे अपने खेती में जो अनाज़ उपजता था, वो अनाज, सब्जीयाँ ,फल, दूध घर भेज देते थे।
कभी कभी एक ही सब्जी चार पाँच बच्चे ले आते तब वो सब्जी गली में दुसरे घरों में बाँटकर ही बहुत सारी बचती थी तब मेरी माँ एक बार सब्जी बनाती और बची हुयी सब्जी सिधे खिचडी मे डाल देती थी। इसलिए हमारे यहाँ गोबी खिचडी, पालक खिचडी, मटार खिचडी, बीन्स की खिचडी, दुधी की खिचडी, सिमला मिरची की खिचडी, टमाटर खिचडी, फुलवर की खिचडी ऐसी बहुत सारी सब्जीयाँ खिचडी में दाल चावल के साथ झिम्मा खेलती थी। हम माँ को कहतें थे, "अच्छा हैं, सब्जी के कारण अपने दाल चावल तो बच जाते हैं।" सभी हँसनें लगते। 'ज्ञान बाँटनें के लिए होता हैं, पैसा कमानें के लिए नहीं' पिताजी की यही सोच की शिक्षा हम सब को सब्जीवाली खिचडी खाकर मिलती थी पर हमें पिताजी की सोच पर गर्व था , हैं और रहेगा। आज की बाजारू शिक्षा प्रणाली को देखकर हम मेरे पिताजी को शत शत प्रणाम करते हैं।
खिचडी से जुड़ी बहुत सारी बातें है। आज के लिए इतना ही।
©ज्योत्स्ना पाटील
©ज्योत्स्ना पाटील
