Wednesday, 1 May 2019

पोहा और बच्चों की संवेदना

सभी पाठ़कोंं को मेरा प्रणाम।
          पोहा और बच्चों की संवेदना
महाराष्ट्रा में सभी जगह पर सुबह के नाश्ते में उपमा, मिसल और पोहा खाया जाता हैं वैसे तो इडली, डोसा, वडा सांभार, सँडविच, छोले भटुरे भी खाते हैं लेकीन ज्यादा तर पोहा, उपमा खाते हैं।
मेरे पती और बच्चे जिस दिन आराम से नाश्ता करते हैं उस दिन मैं नाश्ते की प्लेट सजाकर देती हूँ। दो दिन की छुट्टी थी तो बच्चे घर आए थे सुबह आराम से उठे ब्रश करके सीधे चाय पिने बैठे और बातें करने बैठ गयें। मैने देखा तो अब ये तीनो दो घंटे तक उठनें का नाम नहीं लेंगे मेरे मन ने कहाँ 'चल ज्योत्स्ना, तू चल तेरे  काम पर इनके साथ बैठकर कुछ नहीं होगा क्योंकी ए चिल्लाचिल्लाकर बातें करके थक जायेंगे और बाद में तुझंपर ही चिल्लायेंगे,' "मम्मी भूक लगी, जल्दी नाश्ता दो।" तीनो का बातें करने का मूड देखकर मैं सीधे नाश्ता बनाने के लिए रसोई में गयी। आज नाश्ता आराम से देना था इसलिए मैने पोहा बनाकर प्लेट सजायी।
दिलिप को और बेटा, बेटी तीनो के हाथ में नाश्ते की प्लेट थमा दी। प्लेट की तरफ देखकर मेरा बेटा स्वप्नील बोला, "मम्मी, प्लेट को देखकर खाने का दिल कर रहा हैं लेकीन सजाये हुए पोहा को तोडने का दिल नहीं करता। बेटे की बात सुनकर बहुत अच्छा लगा क्योंकी बेजान चिजों को तोडने का दिल नहीं होता तब मेरा बेटा दुसरे के दिल को तोडने के बारे में सौ बार सोचेगा। किसी के आँगन में रंगोली हो और उस रंगोली पर किसी ने पैर रखकर रंगोली बिघाड दी तो मेरे बेटे और बेटी को बहुत ही बुरा लागता हैं, तब दोनों के मुँह से एक ही बात निकलती हैं, "कौन बेवकूफ था। उसे रंगोली दिखायी नहीं दी क्या!" बच्चे संवेदनशील होना यहीं धनदौलत हैं। 

©ज्योत्स्ना पाटील                

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