Monday, 29 April 2019

puranapoli (sweet paratha)

 सभी खानें के शौकीन लोगों को ज्योत्स्ना का प्यार भरा नमस्तें।
आज मैं आपको महाराष्ट्रीयन पुरणपोली (sweet paratha) कैसे बनातें हैं, इसके बारे में बताना चाहती हूँ।

सामग्री : एक कटोरी चणे की दाल, एक कटोरी शक्कर, एक टी स्पून इलायची पावडर, आधी कटोरी गेहू का आटा, आधी कटोरी मैदा, एक टी स्पून नमक, एक टी स्पून हल्दी, दो बडे चम्मच तेल, आधी कटोरी शुद्ध घी।

बनाने की विधी : आटा और मैदा छननी से छानिये नमक, हल्दी  और तेल मिलाकर उसमे पानी डालकर गुंथिये गीले कपडे से ढक्कर दो घंटे तक रखिये।
प्रेशर कुकर में दो कटोरी पानी डालकर उसमे चना दाल डाल दिजिये। उबाल आने तक उबलने दिजिये बाद में उपर का सफेद तवंग चम्मच से निकाल लिजिये। बाद में प्रेशर कुकर का ढक्कन लगाकर छह शिटीयां बजनें तक गॅसपर रहनें दिजिये। छह सिटियां होने के बाद गॅस बंद कर  दिजिये। ठंडा होने के बाद प्रेशर कुकर खोलकर पकी हुयी चनादाल में से पानी निकाल लिजिये (कढाई में छननी रखकर उसमे कुकर में पकायी हुयी दाल डालकर दाल और पानी अलग अलग कर लेना चाहिये दाल के पानी से मसालेदार करी बना सकते हैं)। पकी हुयी चनादाल में शक्कर डालकर ग्राईंडर में पीस लिजिये। बाद में इलायची पावडर मिला दिजिये इसे 'पुरण' कहा जाता हैं।
गुंथे हुये आटे को आठ बराबर भागो में बांटिये और प्रत्येक भाग के गोले बनाईये उसी तरह पुरण के ही बराबर आठ गोले बनाईये  अब प्रत्येक आटे के गोले को मध्यम आकार की चपाती में बेलिये। उसी चपाती में पुरण का गोला रखकर मोदक जैसा आकार दिजिये  और दोनों हाथोंसे दबाकर फिर से बेलिये और पराठे जैसा आकार दिजिये  और गर्म तवे पर थोडासा घी लगाकर पुरणपोली सुनहरा होने तक सेकिये।
 टिप : पुरणपोली घी के साथ खा सकते हैं। खीर, आम का ज्युस, दूध, दही इसके साथ खाने का आनंद लुटा सकते हैं।
            


पुरनपोली और उससे जुड़ी कुछ यादें
        मैं जब भी पुरनपोली बनाती हुँ तब कुछ यादें ताज़ा हो जाती हैं। आठ दस साल पहले की बात हैंं। मेरी देवरानी आयी थी साथ में मेरे भतीज़े ही थे। मेरे भतीज़े को खाने में मीठा बहुत पसंद था इसिलिए मैने पुरनपोली बनाने के लिए आटा गुंधा और दाल पकाकर पुरन तैयार कर के पुरनपोली बेली और तवेपर सेकनें लगी। तवेपर पुरी तरह से फुली हुयी पुरनपोली को देखकर मेरी देवरानी बोली, "दीदी, आपकी पुरनपोली तो पूरी तरह से फुली हुयी हैं, कितनी सॉफ्ट बनी हैं पुरनपोली।" हम सभी ने बड़े चाव से पुरनपोली का आस्वाद लिया। 
        एक बार मेरी सबसे बड़ी जेठानी मेरे घर आयी तब मैंने उनके लिए पुरनपोली और पुरनपोली के साथ खानें के लिये बासुँदी (रबड़ी) बनायी तो वह बोली, "ज्योत्स्ना, मैं दूध के व्यंजन सेवन नहीं करती। मैंने बासुँदी कभी चखकर ही नहीं देखी तो मैं घी के साथ पुरनपोली खा लुँगी।" जेठानीजी की बात सुनकर मुझे बहुत ही अचरज हुआ, बासुँदी पीना या खाना तो सभी को अच्छा लगता हैं। मैंने पहली बार सुना की, बासुँदी खानें से परहेज करनेवाले को। मैंने बड़े प्यार से जेठानीजी को समझाया की, "दीदी, आप मेरी खातीर बासुँदी और पुरनपोली खा के देखिये। आप को कुछ तकलीफ हुयी तो मैं तुरंत आप को दवा दे दुँगी, आप खा के देखिये कुछ नहीं होगा आप को।" 
      मेरी बात सुनकर मेरी जेठानीजी पुरनपोली बासुँदी के साथ खानें बैठ़ी और पहला नेवाला खानें के बाद बोली, "ज्योत्स्ना, सच में बासुँदी तो बहुतही स्वादिष्ट लगती हैं।" जेठानीजी की तारीफ सुनकर अच्छा लगा और मेरा प्रयास बेकार नहीं हुआ। 
             तिसरा किस्सा मेरी सहेली संगीता का है। मेरी सहेली की बेटी मेरे घर किसी काम के बहानें घर पर आयी थी। वह जब मेरे घर आयी तब मैं पुरनपोली बना रहीं थी। मैंने सहेली की बेटी को कहा, "स्रुष्टी, मम्मी को पुरनपोली पसंद हैं तो पुरनपोली ले के जा।" मैंने पुरनपोली का पार्सल उसके हाथ में थमा दिया। स्रुष्टी घर गयी और मम्मी को बोली, "मम्मी, मौसीनें मेरे लिये पुरनपोली दी हैं।" इतनें में संगीता बेटी को बोली, "मौसीनें, तेरे लिए नहीं मेरे लिए पुरनपोली भेज़ी हैं।" संगीता और स्रुष्टी ने पुरनपोली खानें के बाद तुरंत मुझे फोन किया और बोली, "ज्योत्स्ना, आजतक मैं समझती थी, मेरी पुरनपोली बहुतही सॉफ्ट होती हैं लेकीन तेरे हाथ की बनायी हुयी पुरनपोली खानें के बाद मेरा भ्रम टूट गया। सच में तेरे हाथ की पुरनपोली मुँह में डालतें ही घुल जाती हैं। शुक्रीया पुरनपोली खिलानें के लिये।


       सच में पुरनपोली से जुड़ी बहुत सारी यादें हैं। पुरनपोली बनाना और खिलाना मुझे अच्छा लगता हैं।
        आप भी पुरनपोली बनाइयें और दुसरों को खिलाइये।


©ज्योत्स्ना पाटील 

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